भारत के टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर को वित्त वर्ष 2025-26 में झटका लगा है। Global Trade Research Initiative (जीटीआरआई) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश का कुल वस्त्र और परिधान निर्यात 2.2 प्रतिशत घटकर 35.8 अरब डॉलर पर आ गया है। रुपये के हिसाब से भी इसमें 2.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र की सुस्ती को साफ तौर पर दर्शाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, गिरावट लगभग सभी प्रमुख श्रेणियों में देखने को मिली है। कॉटन टेक्सटाइल निर्यात में 3.9 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि रेडीमेड गारमेंट्स में 1.4 प्रतिशत और कारपेट निर्यात में 5.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। केवल हैंडीक्राफ्ट सेक्टर ने मामूली राहत दी, जहां 1.5 प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली।

इस गिरावट को लेकर विशेषज्ञों ने एक अहम चिंता भी जताई है। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, रुपये और डॉलर के आंकड़ों में जो अंतर दिख रहा है, वह असल स्थिति को उजागर करता है। उनका कहना है कि घरेलू मुद्रा में निर्यात बढ़ता हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार से मिलने वाली कमाई यानी डॉलर में गिरावट हो रही है, जो वास्तविक कमजोरी का संकेत है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि मैन-मेड टेक्सटाइल में रुपये के आधार पर 3.6 प्रतिशत की बढ़त दिखती है, लेकिन डॉलर के हिसाब से यह 0.8 प्रतिशत घट गया। इसी तरह गारमेंट निर्यात रुपये में 2.9 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन डॉलर में 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका मतलब यह है कि निर्यात में दिखाई देने वाली बढ़त वास्तव में मुद्रा विनिमय दर के कारण है, न कि प्रतिस्पर्धात्मक मजबूती की वजह से।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी खो रहा है या नए बाजारों में तेजी से विस्तार नहीं कर पा रहा है। खासतौर पर श्रम-प्रधान क्षेत्रों में यह चिंता और गंभीर हो जाती है, जहां भारत को मजबूत पकड़ बनानी चाहिए थी।
रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI), लॉजिस्टिक्स सुधार और व्यापार सुगमता जैसे प्रयासों के बावजूद निर्यात में अपेक्षित वृद्धि क्यों नहीं हो रही। इस स्थिति को देखते हुए सरकार से मांग की गई है कि वह जल्द से जल्द उन बाधाओं की पहचान करे, जो टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर की निर्यात क्षमता को प्रभावित कर रही हैं।
इस गिरावट ने यह साफ कर दिया है कि केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जमीनी स्तर पर सुधार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।