सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अपनी हालिया ‘कॉकरोच’ टिप्पणी को लेकर उठे विवाद पर सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनकी मौखिक टिप्पणियों को गलत संदर्भ में पेश किया गया और ऐसा दिखाया गया मानो उन्होंने देश के युवाओं का अपमान किया हो, जबकि उनका इशारा फर्जी डिग्री और गलत तरीकों से पेशे में आने वाले लोगों की ओर था।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने उन लोगों की आलोचना की थी जो नकली डिग्रियों के सहारे वकालत और अन्य सम्मानित क्षेत्रों में प्रवेश कर जाते हैं। उनके अनुसार ऐसे लोग व्यवस्था को कमजोर करते हैं और परजीवियों की तरह संस्थाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश के युवाओं के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान है और भारत का युवा वर्ग देश की सबसे बड़ी ताकत है।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय युवाओं की क्षमता और ऊर्जा उन्हें हमेशा प्रेरित करती है। उन्होंने युवाओं को विकसित भारत की नींव बताते हुए कहा कि देश का भविष्य उन्हीं के हाथों में है।
दरअसल यह मामला उस समय चर्चा में आया जब सुप्रीम कोर्ट की पीठ एक वकील को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिए जाने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित वकील के व्यवहार और सोशल मीडिया गतिविधियों पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि हर व्यक्ति वरिष्ठ अधिवक्ता बनने योग्य नहीं होता और पेशे की गरिमा बनाए रखना जरूरी है।
इसी दौरान अदालत ने व्यवस्था में घुसपैठ करने वाले कुछ लोगों पर टिप्पणी की थी, जिसे बाद में सोशल मीडिया पर अलग तरीके से पेश किया गया। इस बयान को लेकर काफी बहस छिड़ गई थी और कई लोगों ने इसे युवाओं से जोड़कर देखा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी डिग्रियों के बढ़ते मामलों पर भी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिए कि कुछ मामलों में डिग्रियों की जांच कराई जा सकती है, क्योंकि अदालत के सामने कई प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठे हैं।

अंत में संबंधित वकील ने अदालत से माफी मांगते हुए अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
