Supreme Court of India में लंबे समय से चल रही सबरीमाला मामले की सुनवाई गुरुवार को पूरी हो गई। नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने लगातार 16 दिनों तक इस मामले पर बहस सुनी और अब फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस अहम मामले की सुनवाई Surya Kant की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने की।
यह मामला केवल केरल के Sabarimala Temple मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुनवाई के दौरान धर्म, परंपरा, मौलिक अधिकार और संवैधानिक नैतिकता जैसे बड़े मुद्दों पर भी बहस हुई। अदालत के सामने यह सवाल भी आया कि धार्मिक परंपराओं में न्यायपालिका कितनी दखल दे सकती है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया। इनमें यह शामिल था कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों की सीमा क्या है। अदालत ने यह भी सुना कि क्या किसी धार्मिक समूह से बाहर का व्यक्ति जनहित याचिका के जरिए उसकी धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है।
इसके अलावा “संवैधानिक नैतिकता” की व्याख्या, धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा और “हिंदुओं के वर्ग” जैसे शब्दों के अर्थ पर भी विस्तृत बहस हुई। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस मामले का फैसला आने वाले समय में कई धार्मिक और सामाजिक विवादों के लिए मिसाल बन सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय तय करेगा कि धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाएगा। देशभर की नजरें इस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हुई हैं।


