महानगरों ने बदल दी मां की जिंदगी: करियर, बच्चे और घर के बीच बढ़ रही नई चुनौतियां

Dwarka September 12, 2026 By Bharat Bhushan Malviya
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कहा जाता है कि “एक बच्चे को बड़ा करने के लिए पूरे गांव की जरूरत होती है।” लेकिन भारत के बड़े शहरों में तेजी से बदलती जीवनशैली ने इस पुरानी व्यवस्था को काफी हद तक बदल दिया है। कभी दादा-दादी, नाना-नानी, रिश्तेदार और पड़ोसी बच्चों की परवरिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। आज महानगरों में बड़ी संख्या में परिवार अकेले यानी न्यूक्लियर फैमिली के रूप में रह रहे हैं।

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दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में महिलाओं के लिए शिक्षा और करियर के अवसर बढ़े हैं। इसके साथ ही आधुनिक मां की जिम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ गई हैं। ऑफिस में बेहतर प्रदर्शन करने से लेकर घर संभालने, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल मीटिंग, खान-पान और उनकी भावनात्मक जरूरतों तक कई जिम्मेदारियां एक साथ निभानी पड़ती हैं।

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डिजिटल दौर ने पैरेंटिंग को और जटिल बनाया है। बच्चों का स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन सुरक्षा, पढ़ाई का दबाव और मानसिक स्वास्थ्य अब माता-पिता की रोजमर्रा की चिंताओं का हिस्सा हैं। इंटरनेट पर पैरेंटिंग से जुड़ी सलाह आसानी से उपलब्ध है, लेकिन जरूरत से ज्यादा जानकारी कई बार भ्रम और दबाव भी बढ़ा देती है।

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इन परिस्थितियों में ‘परफेक्ट मां’ बनने की कोशिश मानसिक और भावनात्मक थकान का कारण बन सकती है। हालांकि एक सकारात्मक बदलाव भी दिखाई दे रहा है—कई परिवारों में पिता अब बच्चों की परवरिश में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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बदलते शहरों के साथ मातृत्व कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि पहले से ज्यादा जटिल और बहुआयामी हो गया है। जरूरत इस बात की है कि बच्चों की परवरिश को केवल मां की जिम्मेदारी न मानकर पिता, परिवार, स्कूल और समाज की साझा जिम्मेदारी बनाया जाए।

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