चेन्नई के कोडुंगैयूर डंप यार्ड में लगी भीषण आग ने एक बार फिर शहरों में बढ़ते कचरे और उसके प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घंटों तक जलते रहे कचरे से निकले घने धुएं ने उत्तरी चेन्नई के आसपास के इलाकों को प्रभावित किया। स्थानीय लोगों को आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और दम घुटने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
विशेषज्ञों के मुताबिक हर बार ऐसी आग जानबूझकर लगाई गई हो, यह जरूरी नहीं है। वर्षों से जमा पुराने कचरे के सड़ने से मीथेन गैस बनती है, जो बेहद ज्वलनशील होती है। तापमान और अन्य परिस्थितियां अनुकूल होने पर कचरे के विशाल ढेर में आग भड़क सकती है और इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।
सबसे बड़ी चिंता इससे होने वाला वायु प्रदूषण है। प्लास्टिक और मिश्रित कचरा जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड, महीन कण और कई हानिकारक रसायन हवा में फैल सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
समस्या केवल हवा तक सीमित नहीं है। ऐसी आग मिट्टी और भूजल को भी प्रदूषित कर सकती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आग लगने के बाद दमकल भेजना स्थायी समाधान नहीं है। डंपिंग साइट पर मीथेन मॉनिटरिंग, CCTV और फायर सेफ्टी सिस्टम लगाने के साथ पुराने कचरे की बायो-माइनिंग तेज करनी होगी।
कोडुंगैयूर की घटना एक चेतावनी है कि कचरा प्रबंधन को केवल सफाई का मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ी प्राथमिकता के रूप में देखना होगा।




