भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने जून 2026 की समीक्षा बैठक में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। यह लगातार तीसरी बार है जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) 5.00 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) 5.50 प्रतिशत पर बरकरार रखी गई हैं।
पहली नजर में यह फैसला सामान्य लग सकता है, लेकिन इसके पीछे RBI की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। इस बार चर्चा केवल महंगाई और विकास दर तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय रुपये की स्थिरता नीति निर्माण के केंद्र में उभरकर सामने आई है।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अपने वक्तव्य में वैश्विक अनिश्चितताओं, बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों और उनके महंगाई तथा वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जताई। यह संकेत था कि केंद्रीय बैंक अब केवल घरेलू आर्थिक संकेतकों पर नहीं, बल्कि वैश्विक घटनाक्रमों पर भी अधिक ध्यान दे रहा है।

बढ़ती चुनौतियां
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसी बीच डॉलर के मुकाबले रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब पहुंच गया है, जिससे आयात और महंगे हो गए हैं।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली, बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता और ऊंची तेल कीमतों के कारण RBI को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा है। इसके चलते देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी कमी दर्ज की गई है।

RBI की नई रणनीति
आमतौर पर किसी मुद्रा पर दबाव बढ़ने पर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाकर विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन RBI ने फिलहाल ऐसा रास्ता नहीं चुना है। इसके बजाय वह विदेशी मुद्रा भंडार, पूंजी प्रवाह और बाजार हस्तक्षेप जैसे उपायों के जरिए रुपये को स्थिर रखने का प्रयास कर रहा है।

RBI का मानना है कि ब्याज दरें बढ़ाने से आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसे समय में जब वैश्विक परिस्थितियां पहले से चुनौतीपूर्ण हैं, विकास दर को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
महंगाई और विकास अनुमान में बदलाव
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर (GDP Growth) का अनुमान घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है, जबकि महंगाई का अनुमान बढ़ाकर लगभग 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है। यह दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक को भविष्य में महंगाई बढ़ने की आशंका दिखाई दे रही है।
तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर रुपया और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां आने वाले महीनों में महंगाई को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि RBI ने दोहराया है कि 4 प्रतिशत महंगाई लक्ष्य उसके लिए अभी भी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

नीति का बदलता केंद्र
इस बार की मौद्रिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि भारतीय रुपया अब केवल आर्थिक नीतियों का परिणाम नहीं रहा, बल्कि स्वयं नीति निर्धारण का प्रमुख कारक बन गया है।
रेपो रेट भले ही स्थिर रखा गया हो, लेकिन RBI ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियां, तेल की कीमतें, पूंजी प्रवाह और रुपये की स्थिति उसकी नीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व होंगे।
जून 2026 की MPC बैठक को इसलिए केवल “रेपो रेट स्थिर रखने” के फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे RBI की प्राथमिकताओं में बदलाव के संकेत के रूप में समझना चाहिए। बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल में रुपये की स्थिरता अब भारतीय मौद्रिक नीति की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बनती जा रही है।