भारतीय संस्कृति में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन देने वाली शक्ति और देवी के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं में सबसे पवित्र मानी जाती हैं मां गंगा। हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाता है, जिसे गंगा जयंती भी कहा जाता है।

यह दिन बेहद खास माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में अवतरित हुई थीं। यही वजह है कि इस दिन को श्रद्धा, आस्था और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

अगर पौराणिक कथा की बात करें, तो यह कहानी राजा सगर के 60 हजार पुत्रों से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि वे कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया, ताकि उनके पवित्र जल से सगर पुत्रों को मोक्ष मिल सके।

लेकिन एक समस्या थी—गंगा का वेग इतना तेज था कि अगर वह सीधे पृथ्वी पर उतरतीं, तो धरती को भारी नुकसान हो सकता था। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और उनके वेग को नियंत्रित किया। मान्यता है कि वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन ही गंगा शिव की जटाओं में समाईं, और बाद में गंगा दशहरा के दिन पृथ्वी पर अवतरित हुईं।
गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और आत्मा शुद्ध होती है। जो लोग गंगा तट तक नहीं पहुंच सकते, वे घर पर स्नान करके गंगाजल का छिड़काव कर सकते हैं और मां गंगा का ध्यान कर सकते हैं।
इस दिन पूजा-पाठ के साथ-साथ दान-पुण्य करना भी बहुत शुभ माना जाता है। प्यासे लोगों को पानी पिलाना, शरबत या ठंडे पेय का वितरण करना और दीपदान करना विशेष फलदायी बताया गया है।
गंगा सप्तमी सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह हमें एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। आज गंगा नदी प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में यह दिन हमें याद दिलाता है कि गंगा की स्वच्छता और संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है।
आखिर में बात यही है कि गंगा सप्तमी आस्था के साथ-साथ प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी समझाने वाला एक पवित्र पर्व है।