चीनी कंपनियों का कब्जा, ऐपल की हिस्सेदारी घटी

Business & Economy April 18, 2026 By Bharat B. Malviya
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भारत के स्मार्टफोन बाजार में साल 2026 की शुरुआत कुछ खास नहीं रही। मार्च तिमाही में स्मार्टफोन की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले छह सालों में सबसे कमजोर प्रदर्शन माना जा रहा है।

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काउंटरपॉइंट रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, इस तिमाही में स्मार्टफोन बिक्री सालाना आधार पर करीब 3 फीसदी घट गई। इस गिरावट के बीच सबसे बड़ा बदलाव बाजार हिस्सेदारी में देखने को मिला है, जहां चीनी कंपनियों का दबदबा और मजबूत हुआ है।

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चीनी ब्रांड्स का आधे बाजार पर कब्जा

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भारत के स्मार्टफोन मार्केट में ओप्पो, वीवो और रियलमी जैसे ब्रांड्स की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी तक पहुंच गई है। खास बात यह है कि ये तीनों ब्रांड एक ही पैरेंट कंपनी BBK Electronics के अंतर्गत आते हैं, जिससे इनका बाजार पर प्रभाव और बढ़ जाता है।

इन कंपनियों ने खासकर मिड-रेंज और बजट सेगमेंट में अपनी पकड़ मजबूत की है, जो भारतीय ग्राहकों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

ऐपल और सैमसंग को झटका

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रीमियम स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी ऐपल की हिस्सेदारी घटकर 12 फीसदी से 9 फीसदी रह गई है। वहीं सैमसंग की बिक्री में भी गिरावट दर्ज की गई है।

इसका मुख्य कारण स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतें और ग्राहकों का अपने पुराने फोन को ज्यादा समय तक इस्तेमाल करना बताया जा रहा है।

क्यों घट रही है बिक्री?

स्मार्टफोन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी इसका बड़ा कारण बनकर सामने आई है।

NAND और DRAM जैसे कंपोनेंट्स महंगे हुए

करेंसी में उतार-चढ़ाव

कंपनियों ने लगभग सभी सेगमेंट में कीमतें बढ़ाईं

रिपोर्ट के अनुसार, औसतन स्मार्टफोन की कीमत करीब 1,500 रुपये तक बढ़ गई है। इसका सबसे ज्यादा असर 15,000 रुपये से कम कीमत वाले सेगमेंट पर पड़ा है, जहां भारतीय बाजार का बड़ा हिस्सा आता है।

यूजर्स का बदला व्यवहार

अब ग्राहक जल्दी-जल्दी फोन बदलने के बजाय अपने डिवाइस को लंबे समय तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे नई खरीदारी में कमी आई है और बाजार की ग्रोथ प्रभावित हुई है।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कीमतों में स्थिरता आती है और कंपनियां नए इनोवेशन के साथ किफायती विकल्प पेश करती हैं, तो आने वाले समय में बाजार फिर से रफ्तार पकड़ सकता है।

फिलहाल के लिए साफ है कि भारतीय स्मार्टफोन बाजार में चीनी कंपनियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है, जबकि प्रीमियम ब्रांड्स को अपनी रणनीति पर फिर से काम करने की जरूरत है।

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