सितंबर 2026 में करीब 38 साल पुराना अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट USA-32 लोअर अर्थ ऑर्बिट में अचानक कई टुकड़ों में बंट गया। अमेरिकी स्पेस फोर्स ने घटना की पुष्टि करते हुए इसके मलबे की निगरानी शुरू कर दी है। फिलहाल किसी सक्रिय अंतरिक्ष यान के लिए तत्काल खतरा नहीं बताया गया है, लेकिन इस घटना ने लंबे समय से कक्षा में मौजूद निष्क्रिय सैटेलाइटों और उनके मलबे से जुड़े जोखिम को फिर सामने ला दिया है। करीब 775 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद इस मलबे के लंबे समय तक कक्षा में बने रहने की आशंका है।
USA-32 को 5 सितंबर 1988 को टाइटन-2 रॉकेट से लॉन्च किया गया था और इसका संबंध नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस के सिग्नल इंटेलिजेंस मिशन से था। बताया जाता है कि शीत युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल सोवियत रडार और रेडियो संकेतों की निगरानी के लिए किया जाता था। 13 सितंबर 2026 को करीब 21:13 UTC पर इसके टूटने की घटना सामने आई। विशेषज्ञों के मुताबिक, दशकों पुराने हार्डवेयर में बैटरी, दबाव वाले टैंक या किसी अन्य उपकरण की खराबी इसके पीछे संभावित कारण हो सकती है, हालांकि वास्तविक वजह अभी स्पष्ट नहीं है।
लंबे समय तक रह सकता है मलबा

775 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडलीय खिंचाव काफी कम होने के कारण सैटेलाइट के टुकड़े लंबे समय तक कक्षा में बने रह सकते हैं। इस क्षेत्र में पहले से बड़ी संख्या में सक्रिय और निष्क्रिय अंतरिक्ष वस्तुएं मौजूद हैं। स्पेस फोर्स ने मलबे को अपनी नियमित ट्रैकिंग और सुरक्षा निगरानी में शामिल कर लिया है। फिलहाल तत्काल टक्कर का खतरा नहीं बताया गया है, लेकिन भविष्य में किसी सक्रिय सैटेलाइट से टकराव की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती।
ऐसी घटनाएं केसलर सिंड्रोम की चिंता को भी बढ़ाती हैं, जिसमें एक अंतरिक्ष मलबे की टक्कर से और अधिक टुकड़े पैदा हो सकते हैं और इससे कक्षा में टक्करों का जोखिम बढ़ सकता है। बढ़ते सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन और हजारों निष्क्रिय अंतरिक्ष वस्तुओं के बीच पुराने हार्डवेयर की निगरानी और सुरक्षित निष्क्रियता अब महत्वपूर्ण चुनौती बनती जा रही है।

ब्लैकबर्ड की चर्चा को लेकर अलग कहानी
इसी दौरान अमेरिकी एयरोस्पेस क्षेत्र में पुराने SR-71 ब्लैकबर्ड से जुड़ी गतिविधियों की चर्चाएं भी सामने आईं। हालांकि, USA-32 के टूटने और ब्लैकबर्ड से जुड़ी खबरों के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। ब्लैकबर्ड एक बेहद तेज और ऊंची उड़ान भरने वाला टोही विमान था, जिसका इस्तेमाल बाद में नासा ने शोध कार्यों के लिए भी किया। इसकी आखिरी उड़ान 1999 में हुई थी।
दोनों घटनाएं एयरोस्पेस क्षेत्र की अलग-अलग चुनौतियों को सामने लाती हैं। जहां USA-32 का टूटना पुराने अंतरिक्ष हार्डवेयर और कक्षीय मलबे की समस्या की याद दिलाता है, वहीं ब्लैकबर्ड से जुड़ी चर्चाएं पुरानी उन्नत तकनीक और विशेषज्ञता को दोबारा इस्तेमाल करने की जटिलताओं को दिखाती हैं। भविष्य में बेहतर बैटरी, सुरक्षित निष्क्रियता प्रणालियों और अधिक सटीक मलबा ट्रैकिंग से ऐसे जोखिमों को कम करने पर जोर दिया जा रहा है।





