देश के तीन राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात में हुए विधानसभा उपचुनावों के नतीजे घोषित हो गए हैं। तीनों राज्यों की एक-एक सीट पर अलग-अलग दलों ने जीत दर्ज की। बिहार की बांकीपुर सीट पर जन सुराज पार्टी, मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस और गुजरात की मांजलपुर सीट पर बीजेपी ने बाजी मारी।
इन तीनों नतीजों में सबसे ज्यादा चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही, जहां जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 19 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में मिली हार ने पार्टी के लिए कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, प्रशांत किशोर की जीत को बिहार की राजनीति में जन सुराज की बढ़ती स्वीकार्यता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

बीजेपी का अभेद्य गढ़ टूटा
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में बीजेपी के करीब तीन दशक पुराने दबदबे को खत्म कर दिया। बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीटों में गिनी जाती रही है। नितिन नवीन के राज्यसभा जाने और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी। नितिन नवीन लगातार पांच बार बांकीपुर से चुनाव जीत चुके थे और उनके परिवार का भी इस क्षेत्र में लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव रहा है।
ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत को महज एक उपचुनाव का नतीजा नहीं माना जा रहा। अपनी पहली चुनावी लड़ाई में ही बीजेपी के मजबूत गढ़ को भेदकर उन्होंने जन सुराज के लिए पहली विधानसभा सीट हासिल की है। इस जीत के जरिए पार्टी ने संकेत दिया है कि वह अब सिर्फ वैकल्पिक राजनीति की बात नहीं कर रही, बल्कि चुनावी मैदान में स्थापित दलों को चुनौती देने की स्थिति में भी पहुंच रही है।
बांकीपुर में बीजेपी की हार के संभावित कारण

1. आक्रामक और जमीनी प्रचार: प्रशांत किशोर के आक्रामक प्रचार अभियान ने बीजेपी को उसके मजबूत गढ़ में कड़ी चुनौती दी।
2. उम्मीदवार बदलने का असर: उम्मीदवार में बदलाव से संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच कथित तौर पर भ्रम की स्थिति बनी।
3. अति-आत्मविश्वास: बीजेपी की मजबूत स्थिति के कारण बूथ स्तर पर रणनीति में ढिलाई का असर नतीजों में दिखाई दिया।
4. कम मतदान: कम मतदान की स्थिति में बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक अपेक्षित संख्या में बाहर नहीं निकल सका।
दतिया में अपने मजबूत बूथ पर भी पीछे रही BJP
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हरा दिया। यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के बाद कराया गया था।

दतिया के नतीजों में एक आंकड़े की भी काफी चर्चा हो रही है। पूर्व बीजेपी नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा के बूथ नंबर 121 पर भी बीजेपी कांग्रेस से पीछे रही। यहां कांग्रेस को 291 वोट मिले, जबकि बीजेपी को 264 वोट हासिल हुए।
इस नतीजे ने बीजेपी के पारंपरिक समर्थक वोट बैंक और बूथ प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पार्टी के भीतर कथित असंतोष और भीतरघात की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
दतिया में बीजेपी के पिछड़ने के संभावित कारण

1. टिकट कटने का असर: डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा रही।
2. जातीय समीकरण: बीजेपी की जातीय रणनीति अपेक्षित परिणाम देने में सफल नहीं रही।

3. स्थानीय पकड़: कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह की स्थानीय पकड़ और मजबूत जनसंपर्क का फायदा पार्टी को मिला।
4. बूथ प्रबंधन: बीजेपी की संगठनात्मक रणनीति और बूथ प्रबंधन अपेक्षाओं के मुताबिक प्रभावी साबित नहीं हुआ।
मांजलपुर में बीजेपी का जलवा बरकरार
गुजरात के वडोदरा की मांजलपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी ने अपना दबदबा कायम रखा। बीजेपी उम्मीदवार सतेंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को 30,630 से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया।
इस जीत के साथ मांजलपुर में बीजेपी का 2012 से चला आ रहा विजय अभियान जारी रहा। यह सीट बीजेपी विधायक योगेश पटेल के निधन के बाद खाली हुई थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में योगेश पटेल ने यहां एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
मांजलपुर का नतीजा बताता है कि गुजरात में बीजेपी का संगठन और उसका पारंपरिक जनाधार अब भी मजबूत बना हुआ है। हालांकि बिहार और मध्य प्रदेश के नतीजों ने बीजेपी के लिए दो अलग-अलग राज्यों में स्थानीय संगठन, उम्मीदवार चयन और बूथ प्रबंधन को लेकर नए सवाल जरूर खड़े किए हैं।
तीन राज्यों के नतीजों का बड़ा संदेश
तीनों उपचुनावों को एक साथ देखें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। बिहार में प्रशांत किशोर ने बीजेपी के मजबूत किले को भेदकर जन सुराज की चुनावी ताकत का संकेत दिया, मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने बीजेपी के प्रभाव वाले दतिया में जीत दर्ज की, जबकि गुजरात में बीजेपी ने अपनी पुरानी पकड़ बरकरार रखी।
इसलिए इन नतीजों को किसी एक पार्टी की व्यापक जीत या हार के बजाय तीन अलग-अलग राज्यों में बदलते स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के संकेत के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।