दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की मिश्रित आय वर्ग (मिक्स्ड इनकम हाउसिंग) योजना, जिसका मकसद अलग-अलग आर्थिक वर्गों के लोगों को एक साथ बसाकर सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना था, अब द्वारका में विवादों के घेरे में आ गई है। यहां कई आवासीय सोसाइटियों में आर्थिक आधार पर बंटवारे की तस्वीर साफ दिखाई दे रही है।
द्वारका की कुछ सोसाइटियों में आरोप हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और निम्न आय वर्ग (एलआईजी) के निवासियों को कई साझा सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। इनमें पार्क, क्लब हाउस, सामुदायिक हॉल, पार्किंग और अन्य सामान्य सुविधाएं शामिल हैं। कई जगहों पर अलग-अलग प्रवेश द्वार और फेंसिंग तक बनाई गई है, जिससे सामाजिक दूरी और ज्यादा बढ़ गई है।
निवासियों का कहना है कि जिन योजनाओं को सामाजिक एकीकरण का मॉडल बनना था, वहां अब वर्ग आधारित विभाजन और भेदभाव की स्थिति बन रही है। ईडब्ल्यूएस और एलआईजी परिवारों का आरोप है कि उन्हें सोसाइटी के फैसलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता और आरडब्ल्यूए (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) में उनकी आवाज कमजोर है।
वहीं दूसरी ओर, कुछ उच्च आय वर्ग के निवासी तर्क देते हैं कि रखरखाव शुल्क, सुविधाओं के उपयोग और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को लेकर व्यावहारिक चुनौतियां हैं, जिनकी वजह से यह विवाद पैदा हो रहा है। उनका कहना है कि आर्थिक योगदान के आधार पर कुछ व्यवस्थाएं अलग रखना जरूरी हो जाता है।
मामला बढ़ने के बाद अब संबंधित एजेंसियों और प्रशासन को मध्यस्थता के लिए कहा गया है। डीडीए और स्थानीय प्रशासन से मांग की गई है कि वे हस्तक्षेप कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें, ताकि सभी निवासियों को समान अधिकार और सुविधाएं मिल सकें।
फिलहाल द्वारका की इन सोसाइटियों में साझा स्थानों, प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर संघर्ष जारी है। यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या शहरी आवास योजनाओं में सामाजिक समावेशन सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है, या इसे जमीन पर लागू करने के लिए और मजबूत नीतियों की जरूरत है।




