चीन की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लंबे समय से माना जाता रहा है कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी मलक्का जलडमरूमध्य है। लेकिन एक नई अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दावा किया है कि चीन के लिए वास्तविक खतरा हजारों किलोमीटर दूर स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य से शुरू होता है।

लंदन स्थित International Institute for Strategic Studies (IISS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चीन की तेल आपूर्ति श्रृंखला की सबसे संवेदनशील कड़ी मलक्का नहीं बल्कि Strait of Hormuz है। यही वह समुद्री मार्ग है जहां से खाड़ी देशों का अधिकांश तेल दुनिया के विभिन्न हिस्सों, खासकर एशिया, तक पहुंचता है।
चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है। तेल लेकर आने वाले जहाज सबसे पहले होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते हैं, फिर हिंद महासागर, मलक्का जलडमरूमध्य और अंततः चीन पहुंचते हैं। ऐसे में यदि होर्मुज में किसी प्रकार का सैन्य या राजनीतिक संकट पैदा होता है, तो चीन तक तेल पहुंचने की पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वर्ष चीन, रूस और ईरान ने संयुक्त रूप से "Maritime Security Belt 2026" नामक नौसैनिक अभ्यास किया था। इसके कुछ समय बाद क्षेत्र में बढ़े तनाव और सैन्य गतिविधियों ने यह दिखा दिया कि होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए कितना संवेदनशील क्षेत्र है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह खतरा केवल चीन तक सीमित नहीं है। Japan जैसे देश भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए इन्हीं समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं। किसी बड़े व्यवधान की स्थिति में पूरे एशिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार हिंद महासागर में इस समय चार प्रमुख शक्तियां प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। इनमें India, France, United States और China शामिल हैं।
भारत को हिंद महासागर क्षेत्र का स्वाभाविक और पारंपरिक शक्ति केंद्र माना जाता है। वहीं फ्रांस के पास पश्चिमी हिंद महासागर में सैन्य ठिकाने और रणनीतिक उपस्थिति है। अमेरिका भी Diego Garcia स्थित अपने सैन्य अड्डे के जरिए पूरे क्षेत्र पर नजर बनाए हुए है।
दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत नया खिलाड़ी माना जाता है। हालांकि उसकी नौसेना तेजी से मजबूत हुई है, लेकिन हिंद महासागर में उसकी मौजूदगी अभी भी भारत, फ्रांस और अमेरिका की तुलना में सीमित मानी जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार चीन अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए हिंद महासागर से जुड़े देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। वह बंदरगाह, सड़कें और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश कर रहा है, साथ ही सैन्य सहयोग और हथियार निर्यात के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में हिंद महासागर वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन सकता है। चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का प्रयास करेगा, जबकि भारत, अमेरिका और फ्रांस भी अपनी रणनीतिक स्थिति बनाए रखने की कोशिश करेंगे।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि चीन के लिए चुनौती केवल समुद्री मार्गों की सुरक्षा नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में प्रभाव स्थापित करना भी है जहां पहले से अन्य शक्तियां मजबूत स्थिति में मौजूद हैं। यही कारण है कि हिंद महासागर आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना रह सकता है।
