मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल में दो बार बढ़ोतरी हो चुकी है और आगे भी दाम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसी बीच रुपये में लगातार गिरावट ने नई चिंता पैदा कर दी है।

रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले एक साल में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 10 से 12 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। कई आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर को भी पार कर सकता है।

ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक आगामी मौद्रिक नीति बैठक में रेपो दर बढ़ाने पर फैसला ले सकता है। यदि ऐसा होता है तो घर, वाहन और अन्य बैंक ऋणों की मासिक किस्तें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर मध्यम वर्ग की जेब पर पड़ेगा।
सूत्रों के अनुसार, रुपये में आई कमजोरी के बाद रिजर्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने हालात की समीक्षा के लिए कई आंतरिक बैठकें की हैं। इनमें ब्याज दरों में बढ़ोतरी, विदेशों से डॉलर जुटाने और विशेष जमा योजनाओं जैसे विकल्पों पर चर्चा हुई है।
जानकारों का कहना है कि यदि रेपो दर बढ़ती है तो बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा और इसका बोझ आम ग्राहकों पर आएगा। इससे पहले वर्ष 2013 में भी रुपये पर दबाव बढ़ने के दौरान इसी तरह के कदम उठाए गए थे। उस समय प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष जमा योजनाएं शुरू कर विदेशी मुद्रा जुटाई गई थी।

बताया जा रहा है कि इस बार भी रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने के लिए प्रवासी भारतीय जमा योजनाओं और डॉलर बॉन्ड जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। अनुमान है कि इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा सकती है।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक जून के पहले सप्ताह में होने वाली है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि केंद्रीय बैंक महंगाई और रुपये की गिरावट को रोकने के लिए कितना बड़ा कदम उठाता है।

