अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट गहराने और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी के बीच रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया है।

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भारत का तेल व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतें देश की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ा सकती हैं।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते कुछ वर्षों से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में गिरावट आई है, जबकि तेल आयात लगातार बढ़ रहा है। इससे व्यापार घाटा और गहरा सकता है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वित्त वर्ष में ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत 90 से 95 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकती है। यदि ऐसा होता है तो भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकता है, जो पहले के अनुमान से काफी ज्यादा होगा।
ऊर्जा संकट का असर आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ने की आशंका जताई गई है। कई वैश्विक एजेंसियों ने भारत की विकास दर के अनुमान में कटौती की है। साथ ही महंगाई बढ़ने और रुपये पर दबाव बढ़ने की संभावना भी व्यक्त की गई है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि अगर लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो परिवहन, बिजली, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी दिखाई देगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार के लिए आने वाले समय में महंगाई नियंत्रण, ऊर्जा प्रबंधन और आर्थिक संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।


