Delhi High Court ने एक अहम मामले में सख्त रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal की 13 अप्रैल की सुनवाई से जुड़े सभी वीडियो और सोशल मीडिया लिंक हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया है और कई लोगों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

क्या है पूरा मामला

यह मामला उस समय सामने आया जब 13 अप्रैल की सुनवाई के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

याचिका में आरोप लगाया गया कि:
अदालत की कार्यवाही को बिना अनुमति रिकॉर्ड किया गया
फिर उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर कर दिया गया
इस मामले में Manish Sisodia, पत्रकार Ravish Kumar और अन्य लोगों के नाम भी सामने आए, जिनको कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत अरोड़ा की पीठ ने साफ कहा कि:
अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग करना
और उसे ऑनलाइन अपलोड करना
बिना अनुमति पूरी तरह अवैध है।
कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सख्त निर्देश
कोर्ट ने सभी सोशल मीडिया कंपनियों को आदेश दिया कि:
ऐसे सभी वीडियो लिंक तुरंत हटाए जाएं
भविष्य में अगर ऐसे वीडियो सामने आएं
तो सूचना मिलते ही उन्हें तुरंत हटाया जाए
साथ ही प्लेटफॉर्म्स को यह भी कहा गया कि वे हटाए गए कंटेंट की जानकारी रजिस्ट्रार जनरल को दें।
कानून का हवाला
कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का हवाला दिया।
इसके तहत:
प्लेटफॉर्म्स को अवैध कंटेंट रोकने की जिम्मेदारी दी गई है
और समय पर कार्रवाई करना जरूरी है
प्लेटफॉर्म्स ने क्या कहा
सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से कहा गया कि:
मूल अपलोडर की पहचान करना आसान नहीं होता
हर कंटेंट को पहले से ब्लॉक करना तकनीकी रूप से मुश्किल है
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि
आधिकारिक सूचना मिलने के बाद वीडियो हटा दिए गए हैं।
केंद्र सरकार का पक्ष
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत में कहा कि:
यह मामला सिर्फ एक वीडियो का नहीं है
बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत सम्मान से जुड़ा है
आगे क्या होगा
कोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है
अगली सुनवाई 6 जुलाई को तय की गई है
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश एक बड़ा संदेश देता है कि:
अदालत की कार्यवाही कोई सार्वजनिक मनोरंजन का माध्यम नहीं है
इसकी रिकॉर्डिंग और प्रसारण नियमों के दायरे में ही होना चाहिए
यह फैसला सोशल मीडिया और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है।