नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लाया गया संविधान (131वां संशोधन) बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखने वाला यह बिल वोटिंग में आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर पाया और 54 वोटों से गिर गया।

करीब 21 घंटे तक चली चर्चा के बाद जब मतदान हुआ, तो कुल 528 सांसदों ने इसमें हिस्सा लिया। बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। हालांकि इस बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी, जो सरकार जुटाने में असफल रही।

यह पिछले 12 वर्षों में पहला मौका है जब केंद्र की मोदी सरकार लोकसभा में कोई महत्वपूर्ण विधेयक पास कराने में नाकाम रही है। इससे पहले सरकार ने अपने अधिकांश बिल आसानी से पारित कराए थे।

इस विधेयक का सीधा संबंध महिला आरक्षण कानून से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव था कि सीटें बढ़ने के बाद नई व्यवस्था के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। अब बिल के गिरने के बाद यह प्रक्रिया टल गई है और माना जा रहा है कि महिला आरक्षण का लाभ 2029 के बजाय 2034 के लोकसभा चुनाव तक टल सकता है।
सरकार ने इस बिल से जुड़े दो अन्य विधेयकों—परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026—पर वोटिंग कराने से इनकार कर दिया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि ये दोनों बिल मुख्य संशोधन से जुड़े हैं, इसलिए अलग से मतदान की आवश्यकता नहीं है।
विपक्ष ने इस दौरान सरकार को घेरते हुए कहा कि वह महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन परिसीमन से जुड़े प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां हैं। विपक्ष का कहना है कि इससे दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है और सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा।
इतिहास के नजरिए से देखें तो यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। 2002 में आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) के बाद पहली बार कोई सरकारी बिल संसद में गिरा है। वहीं 1990 के बाद यह पहला मौका है जब कोई संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका।
अब सरकार के सामने विकल्प है कि वह बिल में संशोधन कर दोबारा पेश करे या विपक्ष के साथ सहमति बनाकर नया प्रस्ताव लाए। आने वाले समय में इस मुद्दे पर सियासी बहस और तेज होने की संभावना है।