# अंतरिक्ष में बढ़ रही जंग की तैयारी, चीन-अमेरिका के ‘शिकारी सैटेलाइट’ पर दुनिया की नजर

आधुनिक युद्ध का अगला मोर्चा अब अंतरिक्ष बनता दिख रहा है। यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के संघर्षों ने साबित किया है कि संचार, नेविगेशन और खुफिया जानकारी के लिए सैटेलाइट कितने अहम हैं। अब अमेरिका, चीन और रूस ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं, जिनसे सैटेलाइट दूसरे अंतरिक्ष यानों का पीछा, निगरानी, जाम या उन्हें निष्क्रिय कर सकते हैं।
जून में चीन के एक गुप्त मानवरहित स्पेसप्लेन से छोटे सैटेलाइट को कक्षा में छोड़े जाने के बाद अमेरिकी विश्लेषकों ने उसकी गतिविधियों पर नजर रखी। रिपोर्टों के मुताबिक, वह वस्तु एक अन्य चीनी सैटेलाइट के करीब गई और फिर वापस स्पेसप्लेन की ओर लौट आई। चीन ऐसे मिशनों के जरिए ऑर्बिटल ऑपरेशन और सैटेलाइट की नजदीकी गतिविधियों में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
चीनी शोध में सैटेलाइट को दूसरे यान के करीब ले जाने, उसे पकड़ने और अंतरिक्ष में ईंधन भरने जैसी तकनीकों पर भी काम किए जाने की जानकारी सामने आई है। रिफ्यूलिंग की क्षमता किसी सैटेलाइट को लंबे समय तक सक्रिय रखने और जरूरत पड़ने पर उसकी कक्षा बदलने में अहम साबित हो सकती है।
अमेरिका भी पीछे नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन और रूस ऐसी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं जो अमेरिकी अंतरिक्ष प्रणालियों को बाधित या नुकसान पहुंचा सकती हैं। जमीन आधारित लेजर, इलेक्ट्रॉनिक जैमर, साइबर हमले और एंटी-सैटेलाइट हथियारों को संभावित खतरों में गिना जा रहा है।

अमेरिका और ब्रिटेन ने पिछले साल अंतरिक्ष में संयुक्त सैन्य अभियान भी किया, जिसमें एक अमेरिकी सैन्य सैटेलाइट को ब्रिटिश सैटेलाइट के करीब भेजा गया। विशेषज्ञ इसे सहयोगी देशों की क्षमता और अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा का संकेत मानते हैं।

इस बीच स्टारलिंक जैसे विशाल सैटेलाइट नेटवर्क और चीन की अपनी योजनाओं के विस्तार से पृथ्वी की कक्षा तेजी से भीड़भाड़ वाली हो रही है। चीन अंतरिक्ष को शांतिपूर्ण उपयोग के लिए बताता है, जबकि अमेरिका पर हथियारों की दौड़ बढ़ाने का आरोप लगाता है। हालांकि, दोनों देशों की बढ़ती सैन्य तैयारियां संकेत दे रही हैं कि भविष्य के बड़े संघर्षों में अंतरिक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
