जूते बनाने वाली प्रसिद्ध कंपनी रेड टेप को ग्राहकों से कैरी बैग के लिए अलग से शुल्क वसूलना महंगा पड़ गया है। हरियाणा के रोहतक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कंपनी को ग्राहक से लिए गए 10 रुपये वापस करने के साथ-साथ 8,000 रुपये मुआवजा और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने इस तरह की वसूली को अनुचित व्यापारिक प्रथा और सेवा में कमी करार दिया है।
मामला 1 अप्रैल 2023 का है, जब एक ग्राहक ने रोहतक स्थित रेड टेप के शोरूम से 2,069.70 रुपये के जूते खरीदे थे। खरीदारी के दौरान कंपनी ने जूतों के साथ दिए गए कैरी बैग के लिए अतिरिक्त 10 रुपये का शुल्क भी बिल में जोड़ दिया। ग्राहक ने स्टोर कर्मचारियों से बिना अतिरिक्त शुल्क के बैग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, लेकिन कर्मचारियों ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह कंपनी की नीति का हिस्सा है।
इसके बाद ग्राहक ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। शिकायत में उसने 10 रुपये की वापसी के अलावा मानसिक उत्पीड़न के लिए 50,000 रुपये तथा मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 22,000 रुपये की मांग की।

सुनवाई के दौरान रेड टेप ने अपने बचाव में कहा कि कैरी बैग पर शुल्क लगाने का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और मुफ्त बैग के दुरुपयोग को रोकना था। कंपनी ने यह भी दावा किया कि स्टोर के प्रवेश द्वार पर ग्राहकों को स्वयं बैग लाने के लिए सूचना प्रदर्शित की गई थी। साथ ही कंपनी ने तर्क दिया कि कैरी बैग खरीदना पूरी तरह वैकल्पिक था और किसी ग्राहक को इसे लेने के लिए बाध्य नहीं किया गया था।
हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने बिल और कैरी बैग से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद पाया कि ग्राहक से बैग के लिए अलग से 10 रुपये वसूले गए थे। आयोग ने कंपनी द्वारा दाखिल हलफनामे की भी समीक्षा की और पाया कि उसमें किए गए कुछ स्वीकारोक्ति वाले बयान ग्राहक के पक्ष को मजबूत करते हैं।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि कंपनी ने अनावश्यक रूप से कैरी बैग के लिए शुल्क वसूला है। यह कार्य मनमाना, अवैध और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। आयोग ने माना कि किसी उत्पाद की खरीद के बाद ग्राहक से कैरी बैग के लिए अतिरिक्त शुल्क लेना सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार की श्रेणी में आता है।
उपभोक्ता आयोग ने रेड टेप को निर्देश दिया कि वह ग्राहक को 10 रुपये की राशि वापस करे। इसके अलावा मानसिक पीड़ा और असुविधा के लिए 4,000 रुपये तथा मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 4,000 रुपये का भुगतान करे। इस प्रकार कंपनी को कुल 8,010 रुपये अदा करने होंगे।

आयोग ने आदेश के पालन के लिए कंपनी को 30 दिनों का समय दिया है। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया तो कंपनी को पूरी राशि का भुगतान होने तक प्रत्येक सप्ताह 50 रुपये अतिरिक्त जुर्माना भी देना होगा।
यह फैसला उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां ग्राहकों पर अनावश्यक शुल्क नहीं थोप सकतीं और यदि ऐसा किया जाता है तो उपभोक्ता कानून के तहत कार्रवाई संभव है।

