दुनिया के 112 देशों में प्रतिबंधित अत्यधिक जहरीले कीटनाशक मोनोक्रोटोफॉस को लेकर भारत में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। यह वही रसायन है जिसे बेहद खतरनाक माना जाता है और कई देशों ने मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और पशु-पक्षियों पर इसके गंभीर असर के कारण पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

मोनोक्रोटोफॉस एक ऑर्गेनोफॉस्फेट वर्ग का कीटनाशक है, जो तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर डालता है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार यह पक्षियों और इंसानों दोनों के लिए अत्यंत विषैला है। इसके संपर्क में आने या गलती से सेवन करने पर मौत तक हो सकती है।
भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। केंद्र सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, इस रसायन का उपयोग पूरी तरह बंद नहीं है। फिलहाल इसे केवल सब्जियों पर इस्तेमाल करने से रोका गया है, जबकि कुछ अन्य फसलों में इसका सीमित उपयोग अभी भी जारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक बड़ा विरोधाभास है। जिन देशों ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया है, वहां इसके नुकसान को लेकर ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने आए हैं। भारत में इसकी उपलब्धता का बड़ा कारण इसकी कम कीमत और किसानों के बीच इसकी प्रभावशीलता मानी जाती है। लेकिन यही सस्ता विकल्प कई बार जानलेवा साबित होता है।
भारत में इस रसायन का नाम पहले भी कई दर्दनाक घटनाओं से जुड़ चुका है। 2013 में बिहार के मिड-डे मील कांड में बच्चों की मौत के पीछे भी इसी जहरीले पदार्थ को जिम्मेदार माना गया था। इसके बाद इस पर सख्ती की मांग और तेज हुई थी।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आंशिक प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है। उनका तर्क है कि जब कोई रसायन इतने बड़े पैमाने पर खतरनाक साबित हो चुका है, तो उसे पूरी तरह हटाना ही बेहतर विकल्प है। वहीं किसान संगठनों का कहना है कि जब तक सुरक्षित और सस्ते विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे, ऐसे रसायनों पर निर्भरता बनी रहेगी।

अब सवाल यही है—जब दुनिया इसे छोड़ चुकी है, तो भारत में इसकी मौजूदगी कब तक बनी रहेगी? यह बहस केवल खेती तक सीमित नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से भी सीधे जुड़ी है।


