आज से अधिकमास की शुरुआत हो गई है, जो 15 जून तक रहेगा। वैदिक परंपरा में इस महीने को बेहद पवित्र माना जाता है। यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पूजा-पाठ, जप, तप और दान का विशेष महत्व होता है।

दरअसल, चंद्र और सौर पंचांग के बीच समय का संतुलन बनाए रखने के लिए यह अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का माना जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए कुछ वर्षों में एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
धार्मिक दृष्टि से यह महीना आत्मचिंतन, संयम और भक्ति का समय माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा करने पर कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। भक्त विष्णु सहस्रनाम का पाठ, सत्यनारायण कथा, मंत्र जाप और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना गया है।

अधिकमास में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और अन्य जरूरी चीजों का दान करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही सात्विक जीवन अपनाने, क्रोध और नकारात्मकता से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
हालांकि इस पूरे महीने में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार जैसी मांगलिक गतिविधियों से परहेज किया जाता है। नई गाड़ी, मकान या महंगी वस्तुओं की खरीदारी भी इस दौरान शुभ नहीं मानी जाती। मान्यता है कि यह समय भौतिक सुखों से ज्यादा आध्यात्मिक उन्नति पर ध्यान देने का होता है।
कई श्रद्धालु पूरे अधिकमास में व्रत भी रखते हैं। इस दौरान साधारण और सात्विक भोजन करने का नियम होता है। प्याज, लहसुन, मांसाहार और अनाज से दूरी रखी जाती है। फल, दूध और व्रत में खाए जाने वाले हल्के आहार का सेवन किया जाता है।
पुराणों के अनुसार, पहले इस अतिरिक्त महीने को अशुभ माना जाता था और इसे मलमास कहा जाता था। कहा जाता है कि जब यह महीना उपेक्षित होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा, तब उन्होंने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” देकर सबसे पवित्र महीनों में स्थान दिया। तभी से अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के रूप में पूजा जाता है।
