हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित समुद्र मंथन की कथा के पीछे महर्षि दुर्वासा का श्राप एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। इस श्राप के कारण स्वर्ग अपनी समृद्धि खो बैठा और देवताओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को एक दिव्य माला भेंट की थी। लेकिन इंद्र ने उस माला का उचित सम्मान नहीं किया और उसे अपने वाहन ऐरावत के सिर पर रख दिया। ऐरावत द्वारा माला को जमीन पर गिराकर रौंद देने से महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए।

क्रोधित होकर उन्होंने इंद्र को श्राप दिया कि उनका वैभव और ऐश्वर्य नष्ट हो जाएगा। इस श्राप के प्रभाव से देवी लक्ष्मी स्वर्ग लोक छोड़कर चली गईं, जिससे स्वर्ग ‘श्री-हीन’ हो गया। परिणामस्वरूप देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा।

स्थिति गंभीर होने पर देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली। इसके बाद विष्णु के निर्देश पर देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया। इसी समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का पुनः प्रकट होना हुआ और देवताओं को उनकी खोई हुई शक्ति व समृद्धि वापस मिली।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह कथा इस बात का संदेश देती है कि अहंकार और अपमान के परिणाम गंभीर हो सकते हैं, जबकि सहयोग और धैर्य से संकट का समाधान संभव है।