### **UNEP की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता; बेहतर हालात में भी वैश्विक तापमान 1.8°C तक पहुंचने का अनुमान, ज्यादा गर्म होती दुनिया में बढ़ेंगे जलवायु जोखिम**
जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया के सामने चुनौती अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक तापमान को औद्योगिक दौर से पहले के स्तर की तुलना में **1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रखना बेहद मुश्किल होता जा रहा है**। आने वाले वर्षों में धरती का औसत तापमान लंबे समय तक इस सीमा से ऊपर रह सकता है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दुनिया 1.5 डिग्री की सीमा को पार करेगी या नहीं, बल्कि यह है कि तापमान **कितना ऊपर जाएगा और भविष्य में उसे दोबारा कम करने में दुनिया कितनी कामयाब हो पाएगी।**
## **सबसे अच्छे हालात में भी 1.8°C तक पहुंच सकता है तापमान**
UNEP के आकलन के मुताबिक, अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपेक्षाकृत बेहतर कदम उठाए जाते हैं, तब भी वैश्विक तापमान करीब **1.8 डिग्री सेल्सियस** तक पहुंच सकता है। इसके बाद लंबे समय में तापमान को धीरे-धीरे नीचे लाने की संभावना जताई गई है।
हालांकि कुछ अन्य अनुमानों में तापमान **2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक** बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है। तापमान में यह अतिरिक्त बढ़ोतरी दुनिया के कई हिस्सों में मौसम से जुड़े खतरों को और गंभीर बना सकती है।

## **1.5°C की सीमा आखिर इतनी अहम क्यों है?**

2015 में हुए **पेरिस जलवायु समझौते** के तहत दुनिया के देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और इसे 1.5 डिग्री तक सीमित करने के प्रयास करने पर सहमति जताई थी।

1.5 डिग्री कोई ऐसी निश्चित सीमा नहीं है, जिसे पार करते ही अचानक कोई एक बड़ी आपदा शुरू हो जाएगी। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, **तापमान में हर अतिरिक्त बढ़ोतरी के साथ जलवायु संबंधी जोखिम बढ़ते जाते हैं।**
ज्यादा गर्म दुनिया में भीषण गर्मी और लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं। कई क्षेत्रों में बाढ़ और अत्यधिक बारिश का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे हिस्सों में लंबे सूखे और पानी की कमी जैसी समस्याएं गंभीर हो सकती हैं।

## **2024 में पहली बार सालाना औसत तापमान 1.5°C से ऊपर**
जलवायु परिवर्तन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि **2024 में वैश्विक औसत तापमान एक कैलेंडर वर्ष के स्तर पर पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया।** उस वर्ष औसत तापमान औद्योगिक दौर से पहले के स्तर की तुलना में करीब 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।

हालांकि वैज्ञानिक यह स्पष्ट करते हैं कि पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री की सीमा का आकलन केवल किसी एक साल के तापमान से नहीं किया जाता। इसके लिए लंबे समय के औसत तापमान और उसके रुझान को देखा जाता है।
## **सिर्फ कार्बन हटाने की तकनीक से नहीं बनेगी बात**
UNEP के मुताबिक, भविष्य में वातावरण से **कार्बन डाइऑक्साइड हटाने वाली तकनीकों** की भी जरूरत पड़ सकती है। इन तकनीकों के जरिए वातावरण में मौजूद अतिरिक्त कार्बन को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
लेकिन फिलहाल इन तकनीकों की क्षमता और इस्तेमाल सीमित है। इसलिए जलवायु संकट से निपटने का मुख्य रास्ता केवल भविष्य की तकनीकों पर निर्भर नहीं हो सकता।
दुनिया को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में **तेजी से और लगातार कटौती** करनी होगी। ऊर्जा, परिवहन, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना भी जरूरी होगा।
## **हर अतिरिक्त डिग्री के साथ बढ़ेगा नुकसान**
जलवायु विशेषज्ञ अजय माथुर ने नेपाल में हुई तबाही को बढ़ते तापमान से जुड़े जोखिमों का उदाहरण बताया। उनका कहना है कि तापमान में बढ़ोतरी का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई बार इसकी कीमत लोगों की जान, घरों और पूरी बस्तियों के उजड़ने के रूप में चुकानी पड़ती है।
UNEP की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि **1.5 डिग्री की सीमा पार होने के बाद जलवायु कार्रवाई की जरूरत खत्म नहीं होती।** इसके उलट, हर अतिरिक्त दशमलव डिग्री के साथ जोखिम बढ़ता जाता है।
इसलिए अब दुनिया के सामने लक्ष्य केवल 1.5 डिग्री की सीमा को बचाना नहीं, बल्कि **तापमान में होने वाली वृद्धि को जितना संभव हो उतना कम रखना और भविष्य में उसे नीचे लाने के रास्ते तैयार करना** है। आने वाले वर्षों में देशों की जलवायु नीतियां और उत्सर्जन में कटौती की रफ्तार यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि धरती आखिर कितनी गर्म होगी।