पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ी अनिश्चितता के बाद अब यमन के हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में भी नौसैनिक नाकाबंदी की घोषणा की है। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर संभावित असर को लेकर आशंकाएं बढ़ा दी हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के खिलाफ यह कदम उठाया है। हालांकि नाकाबंदी का दायरा सीमित बताया जा रहा है, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस समुद्री मार्ग पर किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
वैश्विक तेल बाजार में बढ़ी चिंता
होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से ही दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अब बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बढ़ने से ऊर्जा बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका जताई जा रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है बाब-अल-मंडेब?
बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह स्वेज नहर के दक्षिणी प्रवेश द्वार के रूप में भी कार्य करता है और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है, जिसमें तेल और गैस की बड़ी खेप भी शामिल होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा बनी रहती है, तो जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है, जिससे तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और एलएनजी की आपूर्ति के लिए बाब-अल-मंडेब और होर्मुज दोनों समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारतीय रिफाइनरियां इसी मार्ग के जरिए यूरोप और अन्य देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करती हैं। इसके अलावा वस्त्र, दवाइयां, मशीनरी, बासमती चावल और अन्य कृषि उत्पादों का बड़ा हिस्सा भी लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते यूरोप पहुंचता है।
जानकारों के अनुसार, स्वेज नहर और बाब-अल-मंडेब मिलकर भारत के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं, जबकि यूरोप जाने वाले भारतीय निर्यात का करीब 80 प्रतिशत इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
बढ़ सकती हैं शिपिंग लागत और तेल की कीमतें

यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या समुद्री मार्गों पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो जहाजों को वैकल्पिक लंबे रास्तों का उपयोग करना पड़ सकता है। इससे परिवहन लागत बढ़ने, डिलीवरी में देरी होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, मौजूदा स्थिति लगातार बदल रही है और विभिन्न देशों की सरकारें तथा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में क्षेत्र की स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
