दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मंच G7 में इस बार सिर्फ युद्ध, व्यापार और कूटनीति की नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की शक्ति को लेकर भी बड़ी बहस छिड़ी हुई है। अब AI सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि वैश्विक ताकत का नया हथियार बनता जा रहा है।
अमेरिका ने हाल ही में AI कंपनी Anthropic के कुछ सबसे एडवांस मॉडल्स तक विदेशी नागरिकों और गैर-अमेरिकी संस्थाओं की पहुंच सीमित करने का फैसला लिया है। इस कदम ने यूरोप समेत कई देशों में चिंता बढ़ा दी है। उनका मानना है कि अगर AI तकनीक पर सिर्फ अमेरिका का नियंत्रण रहेगा, तो बाकी देशों का तकनीकी विकास प्रभावित हो सकता है।

इस समय AI सेक्टर में अमेरिका की पकड़ सबसे मजबूत है। OpenAI, Google और Anthropic जैसी कंपनियां दुनिया के सबसे ताकतवर AI मॉडल विकसित कर रही हैं। यही वजह है कि कई देश अब “सॉवरेन AI” यानी अपने देश में विकसित स्वतंत्र AI सिस्टम बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।
फ्रांस में चल रही G7 Summit 2026 में AI अब मुख्य एजेंडा बन चुका है। समिट में Sam Altman, Dario Amodei और Demis Hassabis जैसे बड़े नाम मौजूद हैं। यह दिखाता है कि अब AI केवल टेक कंपनियों का विषय नहीं, बल्कि सरकारों और रणनीतिक गठबंधनों का भी हिस्सा बन चुका है।
यूरोपीय देशों की चिंता यह है कि अगर अमेरिका अपने सबसे शक्तिशाली मॉडल्स की पहुंच सीमित करता है, तो वैश्विक टेक्नोलॉजी बैलेंस बिगड़ सकता है। इसी कारण G7 में “Trusted Partners” का विचार सामने आया है — यानी केवल भरोसेमंद देशों को उन्नत AI तकनीक तक पहुंच दी जाए।
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है। अगर AI एक्सेस सीमित हुआ, तो नई तकनीकों तक पहुंच मुश्किल हो सकती है। लेकिन यदि भारत “Trusted Partner” समूह में शामिल होता है, तो यह देश के लिए एक बड़ा अवसर बन सकता है — खासकर रक्षा, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल अर्थव्यवस्था में।
स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में AI सिर्फ नवाचार का साधन नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्रीय तत्व बन जाएगा। G7 की यह बहस उसी बदलती दुनिया की दिशा दिखा रही है।


