दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों में इस समय एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। एक ओर कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर भारी निवेश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की छंटनी का सिलसिला भी तेज हो गया है। नई रिपोर्ट्स के अनुसार, कई कंपनियां अब हर कर्मचारी के बराबर हर महीने लाखों रुपये AI इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड सेवाओं और डेटा प्रोसेसिंग पर खर्च कर रही हैं। यह संकेत है कि कॉर्पोरेट दुनिया में काम करने का ढांचा तेजी से बदल रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप की कई टेक कंपनियों ने अपने बजट का बड़ा हिस्सा AI सिस्टम्स पर शिफ्ट कर दिया है। इसमें AI टूल्स, मशीन लर्निंग मॉडल, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और क्लाउड बेस्ड सर्विसेज का खर्च शामिल है। इसका सीधा असर कर्मचारियों की संख्या पर पड़ा है, क्योंकि कंपनियां अब कम लोगों के साथ अधिक काम करने की रणनीति अपना रही हैं।
हालिया आंकड़े बताते हैं कि 2026 में AI से जुड़ी वजहों से होने वाली छंटनी का स्तर पिछले दो वर्षों के कुल लेऑफ से भी ज्यादा हो चुका है। कई कंपनियों ने बैक-ऑफिस, कस्टमर सपोर्ट, डेटा एनालिसिस और कंटेंट मॉडरेशन जैसे विभागों में कर्मचारियों की संख्या कम की है और उन्हीं संसाधनों को AI सिस्टम्स पर लगा दिया है।

कंपनियों का मानना है कि AI एक लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है। एक बार सिस्टम स्थापित हो जाने के बाद वह लगातार काम कर सकता है, उसे आराम की जरूरत नहीं होती और बड़े मानव संसाधन की आवश्यकता भी घट जाती है। उदाहरण के तौर पर, जहां पहले कस्टमर सपोर्ट के लिए बड़ी टीम की जरूरत होती थी, अब AI चैटबॉट उसी काम को तेजी और कम लागत में कर रहे हैं।
हालांकि इस बदलाव का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। कुछ कंपनियां अब यह महसूस कर रही हैं कि AI सिस्टम्स का संचालन उतना सस्ता नहीं है जितना शुरुआत में अनुमान लगाया गया था। बड़े पैमाने पर AI मॉडल चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग पावर, क्लाउड स्टोरेज और API क्रेडिट्स की जरूरत होती है, जिससे खर्च लगातार बढ़ रहा है।

Uber Technologies और Microsoft जैसी कंपनियों ने भी माना है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता खर्च उनके बजट पर दबाव बना रहा है। कई मामलों में कंपनियों का वार्षिक AI बजट कुछ ही महीनों में खत्म हो रहा है, जिससे लागत प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जो कंपनियां अभी AI को तेजी से अपना रही हैं, वे फिलहाल मानव संसाधन घटा रही हैं। लेकिन आने वाले वर्षों में संतुलन फिर बदल सकता है, क्योंकि AI की बढ़ती लागत और उसकी सीमाओं के कारण कंपनियों को दोबारा मानव विशेषज्ञों की जरूरत पड़ सकती है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर एंट्री-लेवल और मिड-लेवल नौकरियों पर पड़ रहा है। अब केवल तकनीकी कौशल होना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि AI के साथ काम करने की क्षमता भी जरूरी बनती जा रही है। रोजगार खत्म नहीं हो रहे, लेकिन उनका स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आने वाले समय में वही पेशेवर अधिक सुरक्षित माने जाएंगे जो AI को अपने काम का हिस्सा बनाकर उसके साथ बेहतर तालमेल बैठा सकेंगे।

