इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक चली हाई-लेवल बातचीत बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई। दोनों देशों के बीच यह वार्ता क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने और संभावित शांति समझौते की दिशा में एक अहम कोशिश मानी जा रही थी, लेकिन अंततः प्रमुख मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति JD Vance कर रहे थे। बातचीत के बाद उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका बिना किसी समझौते के लौट रहा है और यह स्थिति ईरान के लिए ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है। वेंस ने जोर देकर कहा कि किसी भी डील के लिए यह जरूरी है कि ईरान स्पष्ट रूप से यह भरोसा दे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिकी रुख को जरूरत से ज्यादा सख्त बताया। ईरानी पक्ष का कहना है कि बातचीत में कई मुद्दों पर प्रगति हुई, लेकिन कुछ अहम बिंदुओं पर मतभेद बने रहे। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार, यह उम्मीद करना कि एक ही बैठक में सभी विवाद खत्म हो जाएंगे, वास्तविकता से परे था।

इस पूरी बातचीत में सबसे बड़ा अड़ंगा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम बना रहा। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है, और इस पर नियंत्रण को ईरान अपनी रणनीतिक ताकत मानता है। अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता पूरी तरह खुला और सुरक्षित रहे, जबकि ईरान इसे अपने हितों के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहता है।
इसी बीच, अमेरिकी सेना ने संकेत दिया है कि वह इस समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठा रही है। आरोप हैं कि ईरान ने इस इलाके में बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाते हुए, Benjamin Netanyahu ने बयान दिया कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनका दावा है कि हालिया हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भारी नुकसान पहुंचा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, Donald Trump ने चीन को चेतावनी दी है कि अगर उसने ईरान को हथियार सप्लाई किए, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि ईरान को जल्द ही नए एयर डिफेंस सिस्टम मिल सकते हैं, हालांकि चीन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है।
पाकिस्तान, जिसने इस वार्ता की मेजबानी की, ने दोनों देशों से संयम बरतने और सीजफायर बनाए रखने की अपील की है। इस्लामाबाद का कहना है कि वह आगे भी मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है, ताकि बातचीत का सिलसिला जारी रह सके।
फिलहाल, अगली बैठक कब और कहां होगी, इस पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेकिन इतना तय है कि मध्य पूर्व में तनाव अभी कम होने वाला नहीं है, और होर्मुज व परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दे आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का केंद्र बने रहेंगे।