पार्किंसंस एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो धीरे-धीरे और खामोशी से शरीर को प्रभावित करती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि मरीज और डॉक्टर दोनों ही अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं। यही वजह है कि बीमारी का सही समय पर पता नहीं चल पाता।

दिल्ली के PSRI अस्पताल के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. भास्कर शुक्ला के अनुसार, अगर शुरुआती संकेतों को समय पर पहचान लिया जाए, तो इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

🔴 आम समस्याओं समझकर कर देते हैं नजरअंदाज

पार्किंसंस के शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं, जैसे—
हाथ-पैरों में हल्का कंपन
शरीर में अकड़न
चलने की रफ्तार धीमी होना
संतुलन बिगड़ना
अक्सर लोग इन्हें बढ़ती उम्र, थकान या तनाव का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर बीमारी को बढ़ने का मौका देती है।
🔴 छोटे-छोटे बदलाव जो संकेत देते हैं बीमारी के
शुरुआत में कुछ बेहद मामूली बदलाव दिखाई देते हैं, जिन पर लोग ध्यान नहीं देते:
लिखते समय अक्षरों का छोटा हो जाना
आवाज का धीमा पड़ना
चेहरे के हाव-भाव में कमी आना
ये संकेत धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन मरीज खुद इन्हें गंभीरता से नहीं लेते।
🔴 दूसरी बीमारियों से मिलते-जुलते लक्षण
पार्किंसंस को पहचानना इसलिए भी मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण कई दूसरी बीमारियों जैसे लगते हैं:
अर्थराइटिस
मांसपेशियों की कमजोरी
डिप्रेशन और एंग्जायटी
लक्षणों की इसी समानता के कारण कई बार डॉक्टर भी शुरुआत में भ्रमित हो जाते हैं और सही डायग्नोस में देरी हो जाती है।
🔴 समय पर पहचान क्यों है जरूरी?
अगर पार्किंसंस की पहचान शुरुआती स्टेज में हो जाए, तो दवाओं और लाइफस्टाइल बदलाव के जरिए इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। देर से पता चलने पर मरीज की दैनिक जिंदगी पर इसका असर ज्यादा बढ़ जाता है।
🔴 बचाव और सावधानी के उपाय
शरीर में होने वाले छोटे बदलावों को नजरअंदाज न करें
लंबे समय तक कंपन या अकड़न रहे तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें
नियमित एक्सरसाइज और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएं
मानसिक तनाव को कम रखें